श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.22.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमहंकारो नभोऽनिलः।

ज्योतिरापः क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव॥ १४

puruṣaḥ prakṛtirvyaktamahaṃkāro nabho'nilaḥ|

jyotirāpaḥ kṣitiriti tattvānyuktāni me nava|| 14

अर्थ

उद्धवजी! (यदि तीनों गुणोंको प्रकृतिसे अलग मान लिया जाय, जैसा कि उनकी उत्पत्ति और प्रलयको देखते हुए मानना चाहिये, तो तत्त्वोंकी संख्या स्वयं ही अट्ठाईस हो जाती है। उन तीनोंके अतिरिक्त पचीस ये हैं—) पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—ये नौ तत्त्व मैं पहले ही गिना चुका हूँ॥ १४॥

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