॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.22.1
अथ द्वाविंशोऽध्यायः
तत्त्वोंकी संख्या और पुरुष-प्रकृति-विवेक
उद्धव उवाच
कति तत्त्वानि विश्वेश संख्यातान्यृषिभिः प्रभो।
नवैकादश पंच त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम॥ १
kati tattvāni viśveśa saṃkhyātānyṛṣibhiḥ prabho|
navaikādaśa paṃca trīṇyāttha tvamiha śuśruma|| 1
अर्थ
उद्धवजीने कहा—प्रभो! विश्वेश्वर! ऋषियोंने तत्त्वोंकी संख्या कितनी बतलायी है? आपने तो अभी (उन्नीसवें अध्यायमें) नौ, ग्यारह, पाँच और तीन अर्थात् कुल अट्ठाईस तत्त्व गिनाये हैं। यह तो हम सुन चुके हैं॥ १॥ किन्तु कुछ लोग छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं तो कुछ पचीस; कोई सात, नौ अथवा छः स्वीकार करते हैं, कोई चार बतलाते हैं तो कोई ग्यारह॥ २॥ इसी प्रकार किन्हीं-किन्हीं ऋषि-मुनियोंके मतमें उनकी संख्या सत्रह है, कोई सोलह और कोई तेरह बतलाते हैं। सनातन श्रीकृष्ण! ऋषि-मुनि इतनी भिन्न संख्याएँ किस अभिप्रायसे बतलाते हैं? आप कृपा करके हमें बतलाइये ॥ ३॥