विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥✎ 1758
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं वेद नापरम्।
वृक्षजीविकया जीवन् व्यर्थं भस्त्रेव यः श्वसन्॥ २२
विषयोंका चिन्तन करते-करते वह विषयरूप हो जाता है। उसका जीवन वृक्षोंके समान जड हो जाता है। उसके शरीरमें उसी प्रकार व्यर्थ श्वास चलता रहता है, जैसे लुहारकी धौंकनीकी हवा। उसे न अपना ज्ञान रहता है और न किसी दूसरेका। वह सर्वथा आत्म-वञ्चित हो जाता है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.21.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 842) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/21/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)