श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.21.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः।

विपर्ययस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्‍चयः॥ २

sve sve'dhikāre yā niṣṭhā sa guṇaḥ parikīrtitaḥ|

viparyayastu doṣaḥ syādubhayoreṣa niścayaḥ|| 2

अर्थ

अपने-अपने अधिकारके अनुसार धर्ममें दृढ़ निष्ठा रखना ही गुण कहा गया है और इसके विपरीत अनधिकार चेष्टा करना दोष है। तात्पर्य यह कि गुण और दोष दोनोंकी व्यवस्था अधिकारके अनुसार की जाती है, किसी वस्तुके अनुसार नहीं॥ २॥✎ 1756 1757

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1756 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-योग्य → करनेयोग्य
  • #1757 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-भूत → पंचभूत

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