॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.20.13
न नरः स्वर्गतिं कांक्षेन्नारकीं वा विचक्षणः।
नेमं लोकं च कांक्षेत देहावेशात् प्रमाद्यति॥ १३
na naraḥ svargatiṃ kāṃkṣennārakīṃ vā vicakṣaṇaḥ|
nemaṃ lokaṃ ca kāṃkṣeta dehāveśāt pramādyati|| 13
अर्थ
यह विधि-निषेधरूप कर्मका अधिकारी मनुष्य-शरीर बहुत ही दुर्लभ है। स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकोंमें रहनेवाले जीव इसकी अभिलाषा करते रहते हैं; क्योंकि इसी शरीरमें अन्तःकरणकी शुद्धि होनेपर ज्ञान अथवा भक्तिकी प्राप्ति हो सकती है, स्वर्ग अथवा नरकका भोगप्रधान शरीर किसी भी साधनके उपयुक्त नहीं है। बुद्धिमान् पुरुषको न तो स्वर्गकी अभिलाषा करनी चाहिये और न नरककी ही। और तो क्या, इस मनुष्य-शरीरकी भी कामना न करनी चाहिये; क्योंकि किसी भी शरीरमें गुणबुद्धि और अभिमान हो जानेसे अपने वास्तविक स्वरूपकी प्राप्तिके साधनमें प्रमाद होने लगता है॥ १२-१३॥