श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भवः।

वासुदेवैकनिलयः स वै भागवतोत्तमः॥ ५०

na kāmakarmabījānāṃ yasya cetasi sambhavaḥ|

vāsudevaikanilayaḥ sa vai bhāgavatottamaḥ|| 50

अर्थ

जिसके मनमें विषय-भोगकी इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीज वासनाओंका उदय नहीं होता और जो एकमात्र भगवान् वासुदेवमें ही निवास करता है, वह उत्तम भगवद्भक्त है॥ ५०॥

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