श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्।

प्रीतः सम्पूजयांचक्रे आसनस्थान् यथार्हतः॥ २६

videhastānabhipretya nārāyaṇaparāyaṇān|

prītaḥ sampūjayāṃcakre āsanasthān yathārhataḥ|| 26

अर्थ

विदेहराज निमिने उन्हें भगवान्‌के परम प्रेमी भक्त जानकर यथायोग्य आसनोंपर बैठाया और प्रेम तथा आनन्दसे भरकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की॥ २६॥

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