श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नवाभवन् महाभागा मुनयो ह्यर्थशंसिनः।

श्रमणा वातरशना आत्मविद्याविशारदाः॥ २०

navābhavan mahābhāgā munayo hyarthaśaṃsinaḥ|

śramaṇā vātaraśanā ātmavidyāviśāradāḥ|| 20

अर्थ

शेष नौ संन्यासी हो गये। वे बड़े ही भाग्यवान् थे। उन्होंने आत्मविद्याके सम्पादनमें बड़ा परिश्रम किया था और वास्तवमें वे उसमें बड़े निपुण थे। वे प्रायः दिगम्बर ही रहते थे और अधिकारियोंको परमार्थ-वस्तुका उपदेश किया करते थे। उनके नाम थे—कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन॥ २०-२१॥✎ 1724 1725

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1724 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कर-भाजन॥ → करभाजन॥
  • #1725 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-भोग → राज्यभोग

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