श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.2.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्।

उपासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जन्मभिस्त्रिभिः॥ १८

sa bhuktabhogāṃ tyaktvemāṃ nirgatastapasā harim|

upāsīnastatpadavīṃ lebhe vai janmabhistribhiḥ|| 18

अर्थ

राजर्षि भरतने सारी पृथ्वीका राज्यभोग किया, परन्तु अन्तमें इसे छोड़कर वनमें चले गये। वहाँ उन्होंने तपस्याके द्वारा भगवान्‌की उपासना की और तीन जन्मोंमें वे भगवान्‌को प्राप्त हुए॥ १८॥✎ 1724 1725

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1724 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कर-भाजन॥ → करभाजन॥
  • #1725 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज्य-भोग → राज्यभोग

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें