॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.2.12
श्रुतोऽनुपठितो ध्यात आदृतो वानुमोदितः।
सद्यः पुनाति सद्धर्मो देव विश्वद्रुहोऽपि हि॥ १२
śruto'nupaṭhito dhyāta ādṛto vānumoditaḥ|
sadyaḥ punāti saddharmo deva viśvadruho'pi hi|| 12
अर्थ
वसुदेवजी! यह भागवतधर्म एक ऐसी वस्तु है, जिसे कानोंसे सुनने, वाणीसे उच्चारण करने, चित्तसे स्मरण करने, हृदयसे स्वीकार करने या कोई इसका पालन करने जा रहा हो तो उसका अनुमोदन करनेसे ही मनुष्य उसी क्षण पवित्र हो जाता है—चाहे वह भगवान्का एवं सारे संसारका द्रोही ही क्यों न हो॥ १२॥