श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.9

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तापत्रयेणाभिहतस्य घोरे

संतप्यमानस्य भवाध्वनीश।

पश्यामि नान्यच्छरणं तवाङ्‌घ्रि-

द्वन्द्वातपत्रादमृताभिवर्षात् ॥ ९

tāpatrayeṇābhihatasya ghore

saṃtapyamānasya bhavādhvanīśa|

paśyāmi nānyaccharaṇaṃ tavāṅghri-

dvandvātapatrādamṛtābhivarṣāt || 9

अर्थ

मेरे स्वामी! जो पुरुष इस संसारके विकट मार्गमें तीनों तापोंके थपेड़े खा रहे हैं और भीतर-बाहर जल-भुन रहे हैं, उनके लिये आपके अमृतवर्षी युगल चरणारविन्दोंकी छत्र-छायाके अतिरिक्त और कोई भी आश्रय नहीं दीखता॥ ९॥

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