॥ श्रीहरिः ॥
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६
jñānavijñānayajñena māmiṣṭvā''tmānamātmani|
sarvayajñapatiṃ māṃ vai saṃsiddhiṃ munayo'gaman|| 6
अर्थ
बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंने ज्ञान-विज्ञानरूप यज्ञके द्वारा अपने अन्तःकरणमें मुझ सब यज्ञोंके अधिपति आत्माका यजन करके परम सिद्धि प्राप्त की है॥ ६॥
ज्ञानविज्ञानयज्ञेन मामिष्ट्वाऽऽत्मानमात्मनि।
सर्वयज्ञपतिं मां वै संसिद्धिं मुनयोऽगमन्॥ ६
बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंने ज्ञान-विज्ञानरूप यज्ञके द्वारा अपने अन्तःकरणमें मुझ सब यज्ञोंके अधिपति आत्माका यजन करके परम सिद्धि प्राप्त की है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 828) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/6/