उद्धव! जिससे मेरी भक्ति हो, वही धर्म है; जिससे ब्रह्म और आत्माकी एकताका साक्षात्कार हो, वही ज्ञान है; विषयोंसे असंग—निर्लेप रहना ही वैराग्य है और अणिमादि सिद्धियाँ ही ऐश्वर्य हैं॥ २७॥
धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम्।
गुणेष्वसंगो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः॥ २७
उद्धव! जिससे मेरी भक्ति हो, वही धर्म है; जिससे ब्रह्म और आत्माकी एकताका साक्षात्कार हो, वही ज्ञान है; विषयोंसे असंग—निर्लेप रहना ही वैराग्य है और अणिमादि सिद्धियाँ ही ऐश्वर्य हैं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 831) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/27/