विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह स्वर्गादि फल देनेवाले यज्ञादि कर्मोंके परिणामी—नश्वर होनेके कारण ब्रह्मलोकपर्यन्त स्वर्गादि सुख—अदृष्टको भी इस प्रत्यक्ष विषय-सुखके समान ही अमंगल, दुःखदायी एवं नाशवान् समझे॥ १८॥✎ 1753
कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्चादमंगलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥ १८
विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह स्वर्गादि फल देनेवाले यज्ञादि कर्मोंके परिणामी—नश्वर होनेके कारण ब्रह्मलोकपर्यन्त स्वर्गादि सुख—अदृष्टको भी इस प्रत्यक्ष विषय-सुखके समान ही अमंगल, दुःखदायी एवं नाशवान् समझे॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.19.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 830) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/19/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)