श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.19.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

आदावन्ते च मध्ये च सृज्यात् सृज्यं यदन्वियात्।

पुनस्तत्प्रतिसंक्रामे यच्छिष्येत तदेव सत्॥ १६

ādāvante ca madhye ca sṛjyāt sṛjyaṃ yadanviyāt|

punastatpratisaṃkrāme yacchiṣyeta tadeva sat|| 16

अर्थ

जो तत्त्ववस्तु सृष्टिके प्रारम्भमें और अन्तमें कारणरूपसे स्थित रहती है, वही मध्यमें भी रहती है और वही प्रतीयमान कार्यसे प्रतीयमान कार्यान्तरमें अनुगत भी होती है। फिर उन कार्योंका प्रलय अथवा बाध होनेपर उसके साक्षी एवं अधिष्ठान रूपसे शेष रह जाती है। वही सत्य परमार्थ वस्तु है, ऐसा समझे॥ १६॥✎ 1753

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1753 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पंच-तन्मात्रा—ये → पंचतन्मात्रा—ये

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