श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स्वयं संचिनुयात् सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम्।

देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाऽऽहृतम्॥ ६

svayaṃ saṃcinuyāt sarvamātmano vṛttikāraṇam|

deśakālabalābhijño nādadītānyadā''hṛtam|| 6

अर्थ

वानप्रस्थाश्रमीको चाहिये कि कौन-सा पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये, कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं—इन बातोंको जानकर अपने जीवन-निर्वाहके लिये स्वयं ही सब प्रकारके कन्द-मूल-फल आदि ले आवे। देश-काल आदिसे अनभिज्ञ लोगोंसे लाये हुए अथवा दूसरे समयके संचित पदार्थोंको अपने काममें न ले*॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    अर्थात् मुनि इस बातको जानकर कि अमुक पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, किस समय लाना चाहिये और कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं, स्वयं ही नवीन-नवीन कन्द-मूल-फल आदिका संचय करे। देश-कालादिसे अनभिज्ञ अन्य जनोंके लाये हुए अथवा कालान्तरमें संचय किये हुए पदार्थोंके सेवनसे व्याधि आदिके कारण तपस्यामें विघ्न होनेकी आशंका है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 822)

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