श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.47

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

वर्णाश्रमवतां धर्म एष आचारलक्षणः।

स एव मद्भक्तियुतो निःश्रेयसकरः परः॥ ४७

varṇāśramavatāṃ dharma eṣa ācāralakṣaṇaḥ|

sa eva madbhaktiyuto niḥśreyasakaraḥ paraḥ|| 47

अर्थ

मैंने तुम्हें यह सदाचाररूप वर्णाश्रमियोंका धर्म बतलाया है। यदि इस धर्मानुष्ठानमें मेरी भक्तिका पुट लग जाय, तब तो इससे अनायास ही परम कल्याणस्वरूप मोक्षकी प्राप्ति हो जाय॥ ४७॥

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