श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम्।

तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ३४

āhārārthaṃ samīheta yuktaṃ tat prāṇadhāraṇam|

tattvaṃ vimṛśyate tena tad vijñāya vimucyate|| 34

अर्थ

भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है॥ ३४॥

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