भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है॥ ३४॥
आहारार्थं समीहेत युक्तं तत् प्राणधारणम्।
तत्त्वं विमृश्यते तेन तद् विज्ञाय विमुच्यते॥ ३४
भिक्षा अवश्य माँगनी चाहिये, ऐसा करना उचित ही है; क्योंकि भिक्षासे ही प्राणोंकी रक्षा होती है। प्राण रहनेसे ही तत्त्वका विचार होता है और तत्त्वविचारसे तत्त्वज्ञान होकर मुक्ति मिलती है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 826) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/34/