श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

वानप्रस्थाश्रमपदेष्वभीक्ष्णं भैक्ष्यमाचरेत्।

संसिध्यत्याश्‍वसंमोहः शुद्धसत्त्वः शिलान्धसा॥ २५

vānaprasthāśramapadeṣvabhīkṣṇaṃ bhaikṣyamācaret|

saṃsidhyatyāśvasaṃmohaḥ śuddhasattvaḥ śilāndhasā|| 25

अर्थ

भिक्षा भी अधिकतर वानप्रस्थियोंके आश्रमसे ही ग्रहण करे; क्योंकि कटे हुए खेतोंके दानेसे बनी हुई भिक्षा शीघ्र ही चित्तको शुद्ध कर देती है और उससे बचा-खुचा मोह दूर होकर सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ २५॥

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