वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और मोक्षपर विचार करे तथा निश्चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना—चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है॥ २२॥
अन्वीक्षेतात्मनो बन्धं मोक्षं च ज्ञाननिष्ठया।
बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयमः॥ २२
वह अपनी ज्ञाननिष्ठासे चित्तके बन्धन और मोक्षपर विचार करे तथा निश्चय करे कि इन्द्रियोंका विषयोंके लिये विक्षिप्त होना—चंचल होना बन्धन है और उनको संयममें रखना ही मोक्ष है॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.18.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 824) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/18/22/