॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.18.20
एकश्चरेन्महीमेतां निःसंगः संयतेन्द्रियः।
आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान् समदर्शनः॥ २०
ekaścarenmahīmetāṃ niḥsaṃgaḥ saṃyatendriyaḥ|
ātmakrīḍa ātmarata ātmavān samadarśanaḥ|| 20
अर्थ
संन्यासीको पृथ्वीपर अकेले ही विचरना चाहिये। उसकी कहीं भी आसक्ति न हो, सब इन्द्रियाँ अपने वशमें हों। वह अपने-आपमें ही मस्त रहे, आत्म-प्रेममें ही तन्मय रहे, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थितियोंमें भी धैर्य रखे और सर्वत्र समानरूपसे स्थित परमात्माका अनुभव करता रहे॥ २०॥