श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम्।

न ह्येते यस्य सन्त्यंग वेणुभिर्न भवेद् यतिः॥ १७

maunānīhānilāyāmā daṇḍā vāgdehacetasām|

na hyete yasya santyaṃga veṇubhirna bhaved yatiḥ|| 17

अर्थ

वाणीके लिये मौन, शरीरके लिये निश्‍चेष्ट स्थिति और मनके लिये प्राणायाम दण्ड हैं। जिसके पास ये तीनों दण्ड नहीं हैं, वह केवल शरीरपर बाँसके दण्ड धारण करनेसे दण्डी स्वामी नहीं हो जाता॥ १७॥

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