श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.15

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

बिभृयाच्चेन्मुनिर्वासः कौपीनाच्छादनं परम्।

त्यक्तं न दण्डपात्राभ्यामन्यत् किंचिदनापदि॥ १५

bibhṛyāccenmunirvāsaḥ kaupīnācchādanaṃ param|

tyaktaṃ na daṇḍapātrābhyāmanyat kiṃcidanāpadi|| 15

अर्थ

यदि संन्यासी वस्त्र धारण करे तो केवल लँगोटी लगा ले और अधिक-से-अधिक उसके ऊपर एक ऐसा छोटा-सा टुकड़ा लपेट ले कि जिसमें लँगोटी ढक जाय। तथा आश्रमोचित दण्ड और कमण्डलुके अतिरिक्त और कोई भी वस्तु अपने पास न रखे। यह नियम आपत्तिकालको छोड़कर सदाके लिये है॥ १५॥

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