श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.13

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इष्ट्वा यथोपदेशं मां दत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे।

अ‌ग्‍नीन् स्वप्राण आवेश्य निरपेक्षः परिव्रजेत्॥ १३

iṣṭvā yathopadeśaṃ māṃ dattvā sarvasvamṛtvije|

agnīn svaprāṇa āveśya nirapekṣaḥ parivrajet|| 13

अर्थ

जो वानप्रस्थी संन्यासी होना चाहे, वह पहले वेदविधिके अनुसार आठों प्रकारके श्राद्ध और प्राजापत्य यज्ञसे मेरा यजन करे। इसके बाद अपना सर्वस्व ऋत्विजको दे दे। यज्ञाग्‍नियोंको अपने प्राणोंमें लीन कर ले और फिर किसी भी स्थान, वस्तु और व्यक्तियोंकी अपेक्षा न रखकर स्वच्छन्द विचरण करे॥ १३॥

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