श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः।

मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते॥ ४१

etāste kīrtitāḥ sarvāḥ saṃkṣepeṇa vibhūtayaḥ|

manovikārā evaite yathā vācābhidhīyate|| 41

अर्थ

उद्धवजी! मैंने तुम्हारे प्रश्‍नके अनुसार संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन किया। ये सब परमार्थ-वस्तु नहीं हैं, मनोविकारमात्र हैं; क्योंकि मनसे सोची और वाणीसे कही हुई कोई भी वस्तु परमार्थ (वास्तविक) नहीं होती। उसकी एक कल्पना ही होती है॥ ४१॥ इसलिये तुम वाणीको स्वच्छन्दभाषणसे रोको, मनके संकल्प-विकल्प बंद करो। इसके लिये प्राणोंको वशमें करो और इन्द्रियोंका दमन करो। सात्त्विक बुद्धिके द्वारा प्रपंचाभिमुख बुद्धिको शान्त करो। फिर तुम्हें संसारके जन्म-मृत्युरूप बीहड़ मार्गमें भटकना नहीं पड़ेगा॥ ४२॥ जो साधक बुद्धिके द्वारा वाणी और मनको पूर्णतया वशमें नहीं कर लेता, उसके व्रत, तप और दान उसी प्रकार क्षीण हो जाते हैं, जैसे कच्चे घड़ेमें भरा हुआ जल॥ ४३॥ इसलिये मेरे प्रेमी भक्तको चाहिये कि मेरे परायण होकर भक्तियुक्त बुद्धिसे वाणी, मन और प्राणोंका संयम करे। ऐसा कर लेनेपर फिर उसे कुछ करना शेष नहीं रहता। वह कृतकृत्य हो जाता है॥ ४४॥

यह व्याख्या श्लोक 11.16.41 से 11.16.44 तककी एक साथ है।

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