श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

येषु येषु च भावेषु भक्त्या त्वां परमर्षयः।

उपासीनाः प्रपद्यन्ते संसिद्धिं तद् वदस्व मे॥ ३

yeṣu yeṣu ca bhāveṣu bhaktyā tvāṃ paramarṣayaḥ|

upāsīnāḥ prapadyante saṃsiddhiṃ tad vadasva me|| 3

अर्थ

बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि आपके जिन रूपों और विभूतियोंकी परम भक्तिके साथ उपासना करके सिद्धि प्राप्त करते हैं, वह आप मुझसे कहिये॥ ३॥✎ 1747

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1747 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आवरण-रहित, → आवरणरहित,

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