श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.19

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नागेन्द्राणामनन्तोऽहं मृगेन्द्रः शृंगिदंष्ट्रिणाम्।

आश्रमाणामहं तुर्यो वर्णानां प्रथमोऽनघ॥ १९

nāgendrāṇāmananto'haṃ mṛgendraḥ śṛṃgidaṃṣṭriṇām|

āśramāṇāmahaṃ turyo varṇānāṃ prathamo'nagha|| 19

अर्थ

निष्पाप उद्धवजी! मैं नागराजोंमें शेषनाग, सींग और दाढ़वाले प्राणियोंमें उनका राजा सिंह, आश्रमोंमें संन्यास और वर्णोंमें ब्राह्मण हूँ॥ १९॥✎ 1748 1749

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1748 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ज्ञान-शक्तिप्रधान → ज्ञानशक्तिप्रधान
  • #1749 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: क्रिया-शक्ति-प्रधान → क्रिया-शक्तिप्रधान

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें