श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.32

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्‍वासात्मनो मुनेः।

मद्धारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा॥ ३२

jitendriyasya dāntasya jitaśvāsātmano muneḥ|

maddhāraṇāṃ dhārayataḥ kā sā siddhiḥ sudurlabhā|| 32

अर्थ

प्यारे उद्धव! जिसने अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है, जो संयमी है और मेरे ही स्वरूपकी धारणा कर रहा है, उसके लिये ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं, जो दुर्लभ हो। उसे तो सभी सिद्धियाँ प्राप्त ही हैं॥ ३२॥

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