श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.25

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

विहरिष्यन् सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत्।

विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्तीः सुरस्त्रियः॥ २५

vihariṣyan surākrīḍe matsthaṃ sattvaṃ vibhāvayet|

vimānenopatiṣṭhanti sattvavṛttīḥ surastriyaḥ|| 25

अर्थ

यदि उसे देवताओंके विहारस्थलोंमें क्रीड़ा करनेकी इच्छा हो, तो मेरे शुद्ध सत्त्वमय स्वरूपकी भावना करे। ऐसा करनेसे सत्त्वगुणकी अंशस्वरूपा सुर-सुन्दरियाँ विमानपर चढ़कर उसके पास पहुँच जाती हैं॥ २५॥

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