॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.14.33
प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः।
विपर्ययेणापि शनैरभ्यसेन्निर्जितेन्द्रियः॥ ३३
prāṇasya śodhayenmārgaṃ pūrakumbhakarecakaiḥ|
viparyayeṇāpi śanairabhyasennirjitendriyaḥ|| 33
अर्थ
इसके बाद पूरक, कुम्भक और रेचक तथा रेचक, कुम्भक और पूरक—इन प्राणायामोंके द्वारा नाड़ियोंका शोधन करे। प्राणायामका अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये और उसके साथ-साथ इन्द्रियोंको जीतनेका भी अभ्यास करना चाहिये॥ ३३॥