श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ

मत्पुण्यगाथाश्रवणाभिधानैः ।

तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं

चक्षुर्यथैवांजनसम्प्रयुक्तम् ॥ २६

yathā yathā''tmā parimṛjyate'sau

matpuṇyagāthāśravaṇābhidhānaiḥ |

tathā tathā paśyati vastu sūkṣmaṃ

cakṣuryathaivāṃjanasamprayuktam || 26

अर्थ

उद्धवजी! मेरी परमपावन लीला-कथाके श्रवण-कीर्तनसे ज्यों-ज्यों चित्तका मैल धुलता जाता है, त्यों-त्यों उसे सूक्ष्म-वस्तुके—वास्तविक तत्त्वके दर्शन होने लगते हैं—जैसे अंजनके द्वारा नेत्रोंका दोष मिटनेपर उनमें सूक्ष्म वस्तुओंको देखनेकी शक्ति आने लगती है॥ २६॥✎ 1744 1745

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1744 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: खिल-खिलाकर → खिलखिलाकर
  • #1745 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पिघल-कर → पिघलकर

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