श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.22

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

धर्मः सत्यदयोपेतो विद्या वा तपसान्विता।

मद्भक्त्यापेतमात्मानं न सम्यक् प्रपुनाति हि॥ २२

dharmaḥ satyadayopeto vidyā vā tapasānvitā|

madbhaktyāpetamātmānaṃ na samyak prapunāti hi|| 22

अर्थ

इसके विपरीत जो मेरी भक्तिसे वञ्चित हैं, उनके चित्तको सत्य और दयासे युक्त, धर्म और तपस्यासे युक्त विद्या भी भलीभाँति पवित्र करनेमें असमर्थ है॥ २२॥✎ 1744 1745

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1744 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: खिल-खिलाकर → खिलखिलाकर
  • #1745 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पिघल-कर → पिघलकर

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