॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.30
यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः।
जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा॥ ३०
yāvannānārthadhīḥ puṃso na nivarteta yuktibhiḥ|
jāgartyapi svapannajñaḥ svapne jāgaraṇaṃ yathā|| 30
अर्थ
जबतक पुरुषकी भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें सत्यत्वबुद्धि, अहंबुद्धि और ममबुद्धि युक्तियोंके द्वारा निवृत्त नहीं हो जाती, तबतक वह अज्ञानी यद्यपि जागता है तथापि सोता हुआ-सा रहता है—जैसे स्वप्नावस्थामें जान पड़ता है कि मैं जाग रहा हूँ॥ ३०॥