श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यावन्‍नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः।

जागर्त्यपि स्वपन्‍नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा॥ ३०

yāvannānārthadhīḥ puṃso na nivarteta yuktibhiḥ|

jāgartyapi svapannajñaḥ svapne jāgaraṇaṃ yathā|| 30

अर्थ

जबतक पुरुषकी भिन्‍न-भिन्‍न पदार्थोंमें सत्यत्वबुद्धि, अहंबुद्धि और ममबुद्धि युक्तियोंके द्वारा निवृत्त नहीं हो जाती, तबतक वह अज्ञानी यद्यपि जागता है तथापि सोता हुआ-सा रहता है—जैसे स्वप्नावस्थामें जान पड़ता है कि मैं जाग रहा हूँ॥ ३०॥

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