श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः।

सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते॥ २

sattvād dharmo bhaved vṛddhāt puṃso madbhaktilakṣaṇaḥ|

sāttvikopāsayā sattvaṃ tato dharmaḥ pravartate|| 2

अर्थ

जब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है, तभी जीवको मेरे भक्तिरूप स्वधर्मकी प्राप्ति होती है। निरन्तर सात्त्विक वस्तुओंका सेवन करनेसे ही सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है और तब मेरे भक्तिरूप स्वधर्ममें प्रवृत्ति होने लगती है॥ २॥

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