श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.13.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः।

अतन्द्रितो मनो युंजन् दोषदृष्टिर्न सज्जते॥ १२

rajastamobhyāṃ yadapi vidvān vikṣiptadhīḥ punaḥ|

atandrito mano yuṃjan doṣadṛṣṭirna sajjate|| 12

अर्थ

यद्यपि विवेकी पुरुषका चित्त भी कभी-कभी रजोगुण और तमोगुणके वेगसे विक्षिप्त होता है, तथापि उसकी विषयोंमें दोषदृष्टि बनी रहती है; इसलिये वह बड़ी सावधानीसे अपने चित्तको एकाग्र करनेकी चेष्टा करता रहता है, जिससे उसकी विषयोंमें आसक्ति नहीं होती॥ १२॥

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