॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.12.21
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं
पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः।
य एष संसारतरुः पुराणः
कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते॥ २१
yasminnidaṃ protamaśeṣamotaṃ
paṭo yathā tantuvitānasaṃsthaḥ|
ya eṣa saṃsārataruḥ purāṇaḥ
karmātmakaḥ puṣpaphale prasūte|| 21
अर्थ
जैसे तागोंके ताने-बानेमें वस्त्र ओतप्रोत रहता है, वैसे ही यह सारा विश्व परमात्मामें ही ओतप्रोत है। जैसे सूतके बिना वस्त्रका अस्तित्व नहीं है; किन्तु सूत वस्त्रके बिना भी रह सकता है, वैसे ही इस जगत्के न रहनेपर भी परमात्मा रहता है; किन्तु यह जगत् परमात्मस्वरूप ही है—परमात्माके बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं है। यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहरूपसे नित्य है। इसका स्वरूप ही है—कर्मकी परम्परा तथा इस वृक्षके फल-फूल हैं—मोक्ष और भोग॥ २१॥