श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमांजितषड्गुणः।

अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः॥ ३१

apramatto gabhīrātmā dhṛtimāṃjitaṣaḍguṇaḥ|

amānī mānadaḥ kalpo maitraḥ kāruṇikaḥ kaviḥ|| 31

अर्थ

वह प्रमादरहित, गम्भीरस्वभाव और धैर्यवान् होता है। भूख-प्यास, शोक-मोह और जन्म-मृत्यु—ये छहों उसके वशमें रहते हैं। वह स्वयं तो कभी किसीसे किसी प्रकारका सम्मान नहीं चाहता, परन्तु दूसरोंका सम्मान करता रहता है। मेरे सम्बन्धकी बातें दूसरोंको समझानेमें बड़ा निपुण होता है और सभीके साथ मित्रताका व्यवहार करता है। उसके हृदयमें करुणा भरी होती है। मेरे तत्त्वका उसे यथार्थ ज्ञान होता है॥ ३१॥

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