श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.27

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।

प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्‍नाय च कथ्यताम्॥ २७

etanme puruṣādhyakṣa lokādhyakṣa jagatprabho|

praṇatāyānuraktāya prapannāya ca kathyatām|| 27

अर्थ

भगवन्! आप ही ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता, सत्यादि लोक और चराचर जगत‍्के स्वामी हैं। मैं आपका विनीत, प्रेमी और शरणागत भक्त हूँ। आप मुझे भक्ति और भक्तका रहस्य बतलाइये॥ २७॥

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