श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.6

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अमान्यमत्सरो दक्षो निर्ममो दृढसौहृदः।

असत्वरोऽर्थजिज्ञासुरनसूयुरमोघवाक् ॥ ६

amānyamatsaro dakṣo nirmamo dṛḍhasauhṛdaḥ|

asatvaro'rthajijñāsuranasūyuramoghavāk || 6

अर्थ

शिष्यको अभिमान न करना चाहिये। वह कभी किसीसे डाह न करे—किसीका बुरा न सोचे। वह प्रत्येक कार्यमें कुशल हो—उसे आलस्य छू न जाय। उसे कहीं भी ममता न हो, गुरुके चरणोंमें दृढ़ अनुराग हो। कोई काम हड़बड़ाकर न करे—उसे सावधानीसे पूरा करे। सदा परमार्थके सम्बन्धमें ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छा बनाये रखे। किसीके गुणोंमें दोष न निकाले और व्यर्थकी बात न करे॥ ६॥

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