श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.11

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तस्माज्जिज्ञासयाऽऽत्मानमात्मस्थं केवलं परम्।

संगम्य निरसेदेतद्वस्तुबुद्धिं यथाक्रमम्॥ ११

tasmājjijñāsayā''tmānamātmasthaṃ kevalaṃ param|

saṃgamya nirasedetadvastubuddhiṃ yathākramam|| 11

अर्थ

प्यारे उद्धव! इस जन्म-मृत्युरूप संसारका कोई दूसरा कारण नहीं, केवल अज्ञान ही मूल कारण है। इसलिये अपने वास्तविक स्वरूपको, आत्माको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये। अपना यह वास्तविक स्वरूप समस्त प्रकृति और प्राकृत जगत‍्से अतीत, द्वैतकी गन्धसे रहित एवं अपने-आपमें ही स्थित है। उसका और कोई आधार नहीं है। उसे जानकर धीरे-धीरे स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर आदिमें जो सत्यत्वबुद्धि हो रही है उसे क्रमशः मिटा देना चाहिये॥ ११॥

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