श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तच्चूर्णयित्वा मुसलं यदुराजः स आहुकः।

समुद्रसलिले प्रास्यल्लोहं चास्यावशेषितम्॥ २१

taccūrṇayitvā musalaṃ yadurājaḥ sa āhukaḥ|

samudrasalile prāsyallohaṃ cāsyāvaśeṣitam|| 21

अर्थ

यदुराज उग्रसेनने उस मूसलको चूरा-चूरा करा डाला और उस चूरे तथा लोहेके बचे हुए छोटे टुकड़ेको समुद्रमें फेंकवा दिया। (इसके सम्बन्धमें उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे कोई सलाह न ली; ऐसी ही उनकी प्रेरणा थी)॥ २१॥

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