श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

तीर्थं चक्रे नृपोनं यदजनि यदुषु स्वःसरित्पादशौचं

विद्विट्स्निग्धाः स्वरूपं ययुरजितपरा श्रीर्यदर्थेऽन्ययत्‍नः ।

यन्‍नामामंगलघ्नं श्रुतमथ गदितं यत्कृतो गोत्रधर्मः

कृष्णस्यैतन्‍न चित्रं क्षितिभरहरणं कालचक्रायुधस्य ॥ ४७

tīrthaṃ cakre nṛponaṃ yadajani yaduṣu svaḥsaritpādaśaucaṃ

vidviṭsnigdhāḥ svarūpaṃ yayurajitaparā śrīryadarthe'nyayatnaḥ |

yannāmāmaṃgalaghnaṃ śrutamatha gaditaṃ yatkṛto gotradharmaḥ

kṛṣṇasyaitanna citraṃ kṣitibharaharaṇaṃ kālacakrāyudhasya || 47

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌का चरणधोवन गंगाजी अवश्य ही समस्त तीर्थोंमें महान् एवं पवित्र हैं। परन्तु जब स्वयं परमतीर्थस्वरूप भगवान्‌ने ही यदुवंशमें अवतार ग्रहण किया, तब तो गंगाजलकी महिमा अपने-आप ही उनके सुयशतीर्थकी अपेक्षा कम हो गयी। भगवान्‌के स्वरूपकी यह कितनी बड़ी महिमा है कि उनसे प्रेम करनेवाले भक्त और द्वेष करनेवाले शत्रु दोनों ही उनके स्वरूपको प्राप्त हुए। जिस लक्ष्मीको प्राप्त करनेके लिये बड़े-बड़े देवता यत्‍न करते रहते हैं, वे ही भगवान्‌की सेवामें नित्य-निरन्तर लगी रहती हैं। भगवान्‌का नाम एक बार सुनने अथवा उच्चारण करनेसे ही सारे अमंगलोंको नष्ट कर देता है। ऋषियोंके वंशजोंमें जितने भी धर्म प्रचलित हैं, सबके संस्थापक भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं। वे अपने हाथमें कालस्वरूप चक्र लिये रहते हैं। परीक्षित्! ऐसी स्थितिमें वे पृथ्वीका भार उतार देते हैं, यह कौन बड़ी बात है॥ ४७॥✎ 1935

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1935 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): काल-स्वरूप → कालस्वरूप

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