॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.90.17
भो भोः सदा निष्टनसे उदन्व-
न्नलब्धनिद्रोऽधिगतप्रजागरः ।
किं वा मुकुन्दापहृतात्मलाञ्छनः
प्राप्तां दशां त्वं च गतो दुरत्ययाम्॥ १७
bho bhoḥ sadā niṣṭanase udanva-
nnalabdhanidro'dhigataprajāgaraḥ |
kiṃ vā mukundāpahṛtātmalāñchanaḥ
prāptāṃ daśāṃ tvaṃ ca gato duratyayām|| 17
अर्थ
अहो समुद्र! तुम निरन्तर गरजते ही रहते हो। तुम्हें नींद नहीं आती क्या? जान पड़ता है तुम्हें सदा जागते रहनेका रोग लग गया है। परन्तु नहीं-नहीं, हम समझ गयीं, हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने तुम्हारे धैर्य, गाम्भीर्य आदि स्वाभाविक गुण छीन लिये हैं। क्या इसीसे तुम हमारे ही समान ऐसी व्याधिके शिकार हो गये हो, जिसकी कोई दवा नहीं है?॥ १७॥