श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.90.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 90 · अथ नवतितमोऽध्यायः

कृष्णस्तु तत्स्तनविषज्जितकुंकुमस्रक्

क्रीडाभिषंगधुतकुन्तलवृन्दबन्धः।

सिंचन् मुहुर्युवतिभिः प्रतिषिच्यमानो

रेमे करेणुभिरिवेभपतिः परीतः॥ ११

kṛṣṇastu tatstanaviṣajjitakuṃkumasrak

krīḍābhiṣaṃgadhutakuntalavṛndabandhaḥ|

siṃcan muhuryuvatibhiḥ pratiṣicyamāno

reme kareṇubhirivebhapatiḥ parītaḥ|| 11

अर्थ

उस समय भगवान् श्रीकृष्णकी वनमाला उन रानियोंके वक्षःस्थलपर लगी हुई केसरके रंगसे रँग जाती। विहारमें अत्यन्त म‌ग्‍न हो जानेके कारण घुँघराली अलकें उन्मुक्त भावसे लहराने लगतीं। वे अपनी रानियोंको बार-बार भिगो देते और रानियाँ भी उन्हें सराबोर कर देतीं। भगवान् श्रीकृष्ण उनके साथ इस प्रकार विहार करते, मानो कोई गजराज हथिनियोंसे घिरकर उनके साथ क्रीड़ा कर रहा हो॥ ११॥

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