श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

उत्तार्य गोपी सुशृतं पयः पुनः

प्रविश्य संदृश्य च दध्यमत्रकम्।

भ‌ग्‍नं विलोक्य स्वसुतस्य कर्म त-

ज्जहास तं चापि न तत्र पश्यती॥ ७

uttārya gopī suśṛtaṃ payaḥ punaḥ

praviśya saṃdṛśya ca dadhyamatrakam|

bhagnaṃ vilokya svasutasya karma ta-

jjahāsa taṃ cāpi na tatra paśyatī|| 7

अर्थ

यशोदाजी औंटे हुए दूधको उतारकर* फिर मथनेके घरमें चली आयीं। वहाँ देखती हैं तो दहीका मटका (कमोरा) टुकड़े-टुकड़े हो गया है। वे समझ गयीं कि यह सब मेरे लालाकी ही करतूत है। साथ ही उन्हें वहाँ न देखकर यशोदा माता हँसने लगीं॥ ७॥✎ 1409 1410

टिप्पणियाँ

  1. *

    यशोदा माता दूधके पास पहुँचीं। प्रेमका अद्भुत दृश्य! पुत्रको गोदसे उतारकर उसके पेयके प्रति इतनी प्रीति क्यों? अपनी छातीका दूध तो अपना है, वह कहीं जाता नहीं। परन्तु यह सहस्रों छटी हुई गायोंके दूधसे पालित पद्मगन्धा गायका दूध फिर कहाँ मिलेगा? वृन्दावनका दूध अप्राकृत, चिन्मय, प्रेमजगत‍्का दूध—माको आते देखकर शर्मसे दब गया। ‘अहो! आगमें कूदनेका संकल्प करके मैंने माके स्नेहानन्दमें कितना बड़ा विघ्न कर डाला? और मा अपना आनन्द छोड़कर मेरी रक्षाके लिये दौड़ी आ रही है। मुझे धिक्कार है।’ दूधका उफनना बंद हो गया और वह तत्काल अपने स्थानपर बैठ गया।

    (मुद्रित पृष्ठ 184)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1409 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँ → मा
  • #1410 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींकेपरका → छीकेपरका

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