श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.9.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

एवं स्वगेहदामानि यशोदा सन्दधत्यपि।

गोपीनां सुस्मयन्तीनां स्मयन्ती विस्मिताभवत्॥ १७

evaṃ svagehadāmāni yaśodā sandadhatyapi|

gopīnāṃ susmayantīnāṃ smayantī vismitābhavat|| 17

अर्थ

यशोदारानीने घरकी सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, फिर भी वे भगवान् श्रीकृष्णको न बाँध सकीं। उनकी असफलतापर देखनेवाली गोपियाँ मुसकराने लगीं और वे स्वयं भी मुसकराती हुई आश्‍चर्यचकित हो गयीं†॥ १७॥✎ 1411 1412

टिप्पणियाँ

  1. †

    वे मन-ही-मन सोचतीं—इसकी कमर मुट्ठीभरकी है, फिर भी सैकड़ों हाथ लम्बी रस्सीसे यह नहीं बँधता है। कमर तिलमात्र भी मोटी नहीं होती, रस्सी एक अंगुल भी छोटी नहीं होती, फिर भी वह बँधता नहीं। कैसा आश्‍चर्य है। हर बार दो अंगुलकी ही कमी होती है, न तीनकी, न चारकी, न एककी। यह कैसा अलौकिक चमत्कार है।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 187)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1411 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँके → माके
  • #1412 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँका → माका

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