श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

तमः सुघोरं गहनं कृतं महद्

विदारयद् भूरितरेण रोचिषा।

मनोजवं निर्विविशे सुदर्शनं

गुणच्युतो रामशरो यथा चमूः॥ ५१

tamaḥ sughoraṃ gahanaṃ kṛtaṃ mahad

vidārayad bhūritareṇa rociṣā|

manojavaṃ nirviviśe sudarśanaṃ

guṇacyuto rāmaśaro yathā camūḥ|| 51

अर्थ

सुदर्शन चक्र अपने ज्योतिर्मय तेजसे स्वयं भगवान्‌के द्वारा उत्पन्‍न उस घने एवं महान् अन्धकारको चीरता हुआ मनके समान तीव्र गतिसे आगे-आगे चला। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था, मानो भगवान् रामका बाण धनुषसे छूटकर राक्षसोंकी सेनामें प्रवेश कर रहा हो॥ ५१॥

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