श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

स आत्मन्युत्थितं मन्युमात्मजायात्मना प्रभुः।

अशीशमद् यथा वह्निं स्वयोन्या वारिणाऽऽत्मभूः॥ ४

sa ātmanyutthitaṃ manyumātmajāyātmanā prabhuḥ|

aśīśamad yathā vahniṃ svayonyā vāriṇā''tmabhūḥ|| 4

अर्थ

परन्तु जब समर्थ ब्रह्माजीने देखा कि यह तो मेरा पुत्र ही है, तब अपने मनमें उठे हुए क्रोधको भीतर-ही-भीतर विवेकबुद्धिसे दबा लिया; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अरणि-मन्थनसे उत्पन्‍न अग्‍निको जलसे बुझा दे॥ ४॥

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