श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.89.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 89 · अथैकोननवतितमोऽध्यायः

मुनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समचेतसाम्।

अकिंचनानां साधूनां यमाहुः परमां गतिम्॥ १७

munīnāṃ nyastadaṇḍānāṃ śāntānāṃ samacetasām|

akiṃcanānāṃ sādhūnāṃ yamāhuḥ paramāṃ gatim|| 17

अर्थ

शान्त, समचित्त, अकिंचन और सबको अभय देनेवाले साधु-मुनियोंकी वे ही एकमात्र परम गति हैं। ऐसा सारे शास्त्र कहते हैं॥ १७॥

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