अब भगवान् पुरुषोत्तमने भयमुक्त शंकरजीसे कहा कि ‘देवाधिदेव! बड़े हर्षकी बात है कि इस दुष्टको इसके पापोंने ही नष्ट कर दिया। परमेश्वर! भला, ऐसा कौन प्राणी है जो महापुरुषोंका अपराध करके कुशलसे रह सके? फिर स्वयं जगद्गुरु विश्वेश्वर! आपका अपराध करके तो कोई सकुशल रह ही कैसे सकता है?’॥ ३८-३९॥
यह अर्थ श्लोक 38–39 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
मुक्तं गिरिशमभ्याह भगवान् पुरुषोत्तमः।
अहो देव महादेव पापोऽयं स्वेन पाप्मना॥ ३८
अब भगवान् पुरुषोत्तमने भयमुक्त शंकरजीसे कहा कि ‘देवाधिदेव! बड़े हर्षकी बात है कि इस दुष्टको इसके पापोंने ही नष्ट कर दिया। परमेश्वर! भला, ऐसा कौन प्राणी है जो महापुरुषोंका अपराध करके कुशलसे रह सके? फिर स्वयं जगद्गुरु विश्वेश्वर! आपका अपराध करके तो कोई सकुशल रह ही कैसे सकता है?’॥ ३८-३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.88.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 692) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/88/38/